श्री महिषासुरमर्दिनी और स्तोत्रम् का (अर्थ सहित) संक्षेप
श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का अर्थ
श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् माँ दुर्गा की शक्ति, साहस और करुणा का वर्णन करता है। इसमें देवी को उस दिव्य शक्ति के रूप में बताया गया है जो अधर्म, अन्याय और अहंकार का नाश करती हैं। महिषासुर का वध केवल एक कथा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भीतर की नकारात्मक शक्तियों को भी साहस और भक्ति से जीता जा सकता है।
श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् के लाभ
इस स्तोत्र का नियमित पाठ मन में साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाता है। यह भय, तनाव और नकारात्मक सोच को कम करने में सहायक माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इससे मानसिक शांति मिलती है और कठिन परिस्थितियों में भी मन मजबूत रहता है। भक्ति भाव से किया गया पाठ मन को स्थिर करता है और जीवन में अनुशासन व संयम लाने में मदद करता है।
श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् कैसे करें?
स्तोत्र का पाठ शांत मन और साफ जगह पर करना सबसे अच्छा माना जाता है। सुबह या शाम का समय उपयुक्त होता है। पहले माँ दुर्गा का ध्यान करें, फिर धीरे-धीरे और ध्यानपूर्वक स्तोत्र का पाठ करें। शब्दों के अर्थ पर मन लगाएँ, केवल जल्दी-जल्दी पढ़ना उद्देश्य नहीं होना चाहिए। नियमितता और श्रद्धा के साथ किया गया पाठ अधिक लाभकारी माना जाता है।
महिषासुरमर्दिनी का महत्व
महिषासुरमर्दिनी का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि ईश्वर की कृपा और अपनी आस्था के साथ हर कठिनाई का सामना किया जा सकता है। यह रूप शक्ति के साथ करुणा और धर्म की रक्षा का संदेश देता है। भक्तों के लिए यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि मन को मजबूत करने और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा है। इस रूप का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर साहस, संयम और सकारात्मक सोच जागृत होती है, जो जीवन को संतुलित बनाती है।
॥ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते ।
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ॥भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोररते ॥
धनुरनुषङ्गरणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्गनटत्कटके ।
कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्गहतावटुके ॥
कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्गरटद्बटुके ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
सुरललनातटथेयि तटथेयि ताटतताळलयन्तरते ।
मुरलिरविन्दकपोलमुकुल मिलितपुलिन्दमनोहरते ॥
तव चरणे चरणे चरणे निननुतनूपुरनादमृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
दुर्जयदुर्धरदुर्षददुर्मुख मर्षिणि हर्षरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते ।
शिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते ॥
मधुमधुरे मधुकैटभ गञ्जिनि कैटभगञ्जिनि रासरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते ।
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ॥
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ॥
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे ।
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोधिकृतामल शूलकरे ॥
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनाद महामुखरीकृत दिङ्मकरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते ।
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणितबीज लते ॥
शिवशिवशुम्भ निशुम्भ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके ॥
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते ।
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ॥
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे ।
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोधिकृतामल शूलकरे ॥
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनाद महामुखरीकृत दिङ्मकरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते ।
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणितबीज लते ॥
शिवशिवशुम्भ निशुम्भ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके ।
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके ॥
जय जय जप्य जयेजय शब्द परस्तुति तत्पर विश्वनुते ।
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुर शिञ्जित मोहित भूतपते ॥
सुमुखि सुमुखी सुमुखी सुमुखी सुमुखी सुमुखी सुमुखी सुमुखी ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
🌺 महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र सम्पूर्ण 21 श्लोकों का हिंदी अर्थ 🌺
श्लोक 1
हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री! आप पूरी पृथ्वी को आनंदित करने वाली, सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करने वाली हैं। विन्ध्याचल पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु की शक्ति और इन्द्र द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 2
हे भगवती! आप शिव-परिवार की अधिष्ठात्री हैं। आप अनंत परिवारों की माता और सृष्टि की रचयिता हैं। हे महिषासुर का संहार करने वाली देवी! सुंदर जटाओं वाली, पर्वतपुत्री, आपकी जय हो।
श्लोक 3
आप देवताओं पर कृपा बरसाने वाली हैं। दुष्टों के अभिमान को नष्ट करने वाली हैं। तीनों लोकों का पालन करने वाली और भगवान शिव को प्रसन्न करने वाली हैं।
श्लोक 4
आप धनुष-बाण धारण कर युद्ध में प्रवृत्त रहती हैं। युद्ध में आपके अंग तेज से चमकते हैं। आपके स्वर्ण समान अस्त्र शत्रुओं को भयभीत करते हैं और वीर शत्रुओं का नाश कर देते हैं।
श्लोक 5
आपने चारों प्रकार की सेनाओं को नष्ट किया। रणभूमि में आपकी गर्जना से पृथ्वी कांप उठती है। हे महिषासुर का वध करने वाली देवी! हे हिमालय की पुत्री! आपकी जय हो।
श्लोक 6
देवांगनाओं के नृत्य और ताल से युक्त, ताल-लय में रमण करने वाली हैं। आपका मुख कमल के समान सुंदर है और आप सबका मन मोह लेती हैं।
श्लोक 7
आपके प्रत्येक चरण में घुँघरुओं की मधुर ध्वनि गूंजती है। हे महिषासुर का नाश करने वाली देवी! हे पर्वतराज की पुत्री! आपकी जय हो।
श्लोक 8
आप दुर्जय, शक्तिशाली और भयानक दैत्यों का नाश करती हैं। दुष्टों के अभिमान को चूर कर भक्तों के हृदय में आनंद भर देती हैं।
श्लोक 9
हे जगत माता! हे मेरी माता! आप कदंब वन में निवास करने वाली हैं। हिमालय के ऊँचे शिखरों पर आपका दिव्य निवास स्थान है।
श्लोक 10
आप मधु और कैटभ जैसे दैत्यों का संहार करने वाली हैं। रणभूमि में रक्तरंजित युद्ध में रमण करने वाली, हे महिषासुर का वध करने वाली देवी! हे हिमालय की पुत्री! आपकी जय हो।
श्लोक 11
आपका तेज बिजली के समान प्रखर है। आपके शस्त्र दैत्यों के शरीर को चीर देते हैं। आप युद्ध में अदम्य साहस से भरपूर और शत्रुओं का संपूर्ण नाश करने वाली हैं।
श्लोक 12
आपके चरणों में समर्पित भक्त सभी भय और दुःख से मुक्त हो जाते हैं। आप भक्तों को निर्भयता और शांति प्रदान करती हैं।
श्लोक 13
आप असुरों के गर्व को नष्ट करने वाली हैं। आपका क्रोध दुष्टों के लिए विनाशकारी और भक्तों के लिए कल्याणकारी है।
श्लोक 14
आप समस्त संसार की माता हैं। आपकी कृपा से ही जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्लोक 15
आप करुणा, दया और ममता की सागर हैं। आप अपने भक्तों के कष्ट हर उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
श्लोक 16
आपका स्मरण मात्र भय, रोग और पापों का नाश करता है। आप शरणागत भक्तों की सदा रक्षा करती हैं।
श्लोक 17
आपकी भक्ति से मन शुद्ध होता है। आपका ध्यान करने से जीवन में स्थिरता और शांति आती है।
श्लोक 18
हे देवी! आप ज्ञान, शक्ति और वैराग्य की मूर्ति हैं। आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार का कारण हैं।
श्लोक 19
आपके चरणों में नतमस्तक होकर भक्त सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। आप मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।
श्लोक 20
जो भक्त श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन के सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 21 (फलश्रुति)
हे महिषासुरमर्दिनी माता! आपकी स्तुति करने वाला व्यक्ति सुख, समृद्धि, विजय और अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
महिषासुरमर्दिनी कौन हैं?
महिषासुरमर्दिनी देवी दुर्गा का वह रूप हैं जिन्होंने महिषासुर का वध कर अधर्म का अंत किया।
महिषासुर का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
महिषासुर अहंकार, अधर्म और नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का मुख्य संदेश क्या है?
यह स्तोत्र अधर्म पर धर्म की विजय, नारी शक्ति और आत्मबल का संदेश देता है।
महिषासुरमर्दिनी का रूप भक्तों को क्या प्रेरणा देता है?
यह रूप साहस, धैर्य और हर कठिनाई का सामना करने की प्रेरणा देता है।
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का पाठ कब करना शुभ माना जाता है?
नवरात्रि, अष्टमी, नवमी और प्रातःकाल इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
निष्कर्ष
महिषासुरमर्दिनी देवी दुर्गा की अपार शक्ति, साहस और धर्म की विजय को दर्शाता है। यह न केवल भक्ति की भावना जगाता है, बल्कि नारी शक्ति, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी देता है, जो हर भक्त और पाठक को प्रेरित करता है।
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