सनातन नववर्ष: कब, क्यों और कैसे शुरू हुआ

Sanatan Diary

 सनातन नववर्ष: कब, क्यों और कैसे शुरू हुआ

सनातन धर्म का पंचांग कैलेंडर ब्रह्मा विष्णु महेश के साथ
सनातन परंपरा केवल किसी एक कालखंड या मत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सृष्टि, काल और चेतना के शाश्वत नियमों पर आधारित जीवन-पद्धति है। इसी सनातन परंपरा में नववर्ष की अवधारणा भी केवल कैलेंडर बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र, ऋतु परिवर्तन और धर्मचक्र के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।

आज प्रचलित अंग्रेज़ी कैलेंडर का नया साल 1 जनवरी को मनाया जाता है, किंतु सनातन धर्म में नववर्ष का निर्धारण सूर्य, चंद्र, ऋतु और सृष्टि-चक्र के आधार पर किया जाता है। इस लेख में हम शास्त्रों के अनुसार विस्तार से समझेंगे:
सनातन नववर्ष कब होता है
इसे मनाने का कारण क्या है, इसकी शुरुआत कब और किसने की, वर्ष की गणना कितने भागों में होती है
कौन-से ग्रह, नक्षत्र और देवता इससे जुड़े हैं
शास्त्रीय प्रमाण और आध्यात्मिक रहस्य, यह लेख पूर्णतः मौलिक है और किसी भी स्रोत से शब्दशः नहीं लिया गया है।
सनातन नववर्ष कब होता है?
सनातन नववर्ष का शास्त्रीय चित्र ब्रह्मा और विष्णु के साथ
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वास्तविक नववर्ष
शास्त्रों के अनुसार सनातन नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। यही तिथि:
विक्रमी संवत का प्रारंभ मानी जाती है, नवरात्रि का पहला दिन होती है, सृष्टि आरंभ का प्रतीक दिवस मानी जाती है,
यह तिथि सामान्यतः मार्चअप्रैल के बीच आती है।
शास्त्रीय संकेत: चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि।” अर्थात ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन की। इस कारण यह तिथि केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि 'सृष्टिगत नववर्ष' मानी जाती है।सनातन नववर्ष क्यों मनाया जाता है?सृष्टि-चक्र का पुनः आरंभ
सनातन दर्शन के अनुसार समय रेखीय नहीं, बल्कि चक्रीय (Cyclic) है। प्रत्येक वर्ष प्रकृति पुनः नवजीवन धारण करती है:
वृक्षों में नई कोपलें
खेतों में नई फसल
जीव-जंतुओं में प्रजनन काल
चैत्र मास में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखता है। इसलिए इसे 'प्राकृतिक नववर्ष' कहा गया।
धर्म और कर्म का नव आरंभ
मनुस्मृति और धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि:
नए व्रत
नए संकल्प
नए यज्ञ
इसी काल से प्रारंभ करना श्रेष्ठ माना गया है। आध्यात्मिक ऊर्जा का उत्कर्ष, चैत्र नवरात्रि में शक्ति-साधना का विशेष महत्व है। यह समय: साधना के लिए श्रेष्ठ, तप और संयम के लिए उपयुक्त, मन और बुद्धि की शुद्धि हेतु अनुकूल

सनातन नववर्ष की शुरुआत कब और किसने की?

सृष्टिकाल से जुड़ा नववर्ष, सनातन परंपरा में किसी एक व्यक्ति को इसका प्रवर्तक नहीं माना गया। क्योंकि:
सनातन धर्म अपौरुषेय है:
इसके नियम वेदों से प्रकट हुए हैं ब्रह्मा को सृष्टि-कर्ता माना गया, किंतु वे भी 'काल-नियमों के अधीन' हैं।
ब्रह्मा द्वारा सृष्टि आरंभ
पुराणों के अनुसार:
ब्रह्मा का एक दिन = कल्प
गुफा में कमल पर विराजमान माता लक्ष्मी की तपस्वी द्वारा पूजा करते हुए दिव्य छवि
उसी कल्प के आरंभ में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से सृष्टि प्रारंभ हुई, इसलिए यह नववर्ष मानव-निर्मित नहीं, बल्कि सृष्टि-संलग्न है।
सनातन परंपरा में वर्ष की गणना कैसे होती है? सनातन धर्म में वर्ष को कई भागों में विभाजित कर देखा जाता है:संवत्सर (60 वर्ष चक्र)
एक महायुग में 60 संवत्सर होते हैं, जैसे:
प्रभव
विभव
शुक्ल
प्रमोद
आनंद
प्रत्येक संवत्सर का अपना फल और प्रभाव बताया गया है।
आयन (2 भाग)
वर्ष को दो आयनों में बांटा गया है:
उत्तरायण सूर्य का उत्तर गमन
दक्षिणायन सूर्य का दक्षिण गमन
ऋतु (6 भाग)
प्रत्येक वर्ष में छह ऋतुएँ होती हैं:
1. वसंत
2. ग्रीष्म
3. वर्षा
4. शरद
5. हेमंत
6.
शिशिर
चैत्र नववर्ष वसंत ऋतु के साथ आरंभ होता है, जो सर्वाधिक संतुलित मानी जाती है।
सनातन कालगणना:
युग, मन्वंतर और कल्प का संबंध नववर्ष से सनातन परंपरा में समय को केवल दिनों और महीनों में नहीं मापा गया, बल्कि उसे युग, मन्वंतर और कल्प जैसे विशाल आयामों में समझा गया। नववर्ष इसी विराट कालचक्र का सूक्ष्म प्रतिबिंब है।
चार युग और वर्ष की चेतना
चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग धर्म के क्रमिक क्षय और पुनर्स्थापना का प्रतीक हैं। जैसे युग बदलते हैं, वैसे ही प्रत्येक वर्ष मनुष्य को आत्म-समीक्षा और धर्म-पुनर्निर्माण का अवसर देता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इसीलिए चुनी गई क्योंकि यह नव सृजन की मानसिक तैयारी का काल है।
मन्वंतर और मानव-समाज
एक मन्वंतर में 71 महायुग होते हैं। प्रत्येक मन्वंतर में एक मनु होते हैं, जो मानव-सभ्यता को धर्म, नियम और आचार प्रदान करते हैं। मनु-स्मृति में वर्षारंभ को नियम-स्थापना का दिन माना गया है। अतः नववर्ष केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के पुनः संतुलन का अवसर है।
कल्प और ब्रह्मा का दिन
एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन है। इसी कल्प के आरंभ में सृष्टि का प्राकट्य हुआ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को उसी आद्य सृजन-स्मृति से जोड़ा गया है। इसलिए सनातन नववर्ष को कभी भी किसी राजा या शासन से नहीं जोड़ा गया।
संवत्सरों का रहस्य और उनका प्रभाव
सनातन पंचांग में वर्ष केवल 12 महीनों का समूह नहीं है, बल्कि वह 60 संवत्सरों के चक्र में घूमता है। प्रत्येक संवत्सर का अपना स्वभाव, फल और मानसिक प्रभाव बताया गया है।
इन संवत्सरों के नाम जैसे प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, आनंद केवल नाम नहीं, बल्कि उस वर्ष की ऊर्जा-संरचना को दर्शाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस संवत्सर में व्यक्ति जन्म लेता है, उसका प्रभाव जीवनभर रहता है।

इन संवत्सरों के नाम जैसे प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, आनंद केवल नाम नहीं, बल्कि उस वर्ष की ऊर्जा-संरचना को दर्शाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस संवत्सर में व्यक्ति जन्म लेता है, उसका प्रभाव जीवनभर रहता है।
मास (12 महीने)
चैत्र से फाल्गुन तक 12 मास होते हैं। प्रत्येक मास किसी न किसी देवता और ग्रह से जुड़ा है। कौन-से ग्रह और नक्षत्रों में परिवर्तन होता है? सूर्य का मेष राशि में प्रभाव चैत्र काल में सूर्य का प्रभाव मेष राशि की ओर बढ़ता है, जो:
ऊर्जा
आरंभ
नेतृत्व
का प्रतीक है। चंद्र की गणना से तिथि निर्धारण
सनातन पंचांग चंद्र-सौर आधारित है:
तिथि चंद्र से
मास चंद्र से
वर्ष सूर्य से
नक्षत्रों का संतुलन
नववर्ष पर संवत्सर परिवर्तन होने से:
सामूहिक मानसिकता बदलती है, सामाजिक घटनाओं की दिशा प्रभावित होती है, कृषि, वर्षा और उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है:
चैत्र मास को ही वर्षारंभ क्यों माना गया?
प्रकृति का संतुलन
चैत्र मास में:
न अधिक शीत
न अधिक उष्णता
न अत्यधिक वर्षा

यह संतुलन मानव शरीर और मन के लिए सर्वोत्तम है। इसलिए शास्त्रों ने इसे नव आरंभ के योग्य माना।
नववर्ष के समय:नक्षत्रों की स्थिति स्थिर मानी जाती है मानसिक और प्राकृतिक संतुलन बढ़ता है, कौन-से देवी-देवता सनातन नववर्ष से जुड़े हैं? ब्रह्मा सृष्टि के अधिष्ठाता, नववर्ष ब्रह्मा से जुड़ा है क्योंकि वे सृष्टि-कर्ता हैं।
मां दुर्गा शक्ति का प्राकट्य

नववर्ष के साथ ही नवरात्रि का प्रारंभ होना कोई संयोग नहीं है।

नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा करते पुजारी का दृश्य
नवरात्रि में शक्ति के नौ रूपों की उपासना: मन की नौ प्रवृत्तियों का शोधन, अहंकार का क्षय, आत्मबल का विकास
का प्रतीक है। इसीलिए नववर्ष की शुरुआत शक्ति-साधना से कराई गई।
आज के समय में सनातन नववर्ष का महत्व, आज जब जीवन कृत्रिम कैलेंडरों और तेज़ रफ्तार में बंध गया है, तब सनातन नववर्ष हमें: प्रकृति से जुड़ने, अपने कर्मों का पुनर्मूल्यांकन करने, मानसिक शांति पाने का अवसर देता है।
यह कोई धार्मिक कट्टरता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संतुलन की प्रणाली है।
चैत्र नवरात्रि में:
आदिशक्ति की उपासना नव रूपों की साधनाकी जाती है।
विष्णु धर्म संरक्षण
वर्षारंभ पर विष्णु-स्मरण से धर्म और मर्यादा की रक्षा का संकल्प लिया जाता है
ग्रहों का सूक्ष्म प्रभाव: केवल सूर्य नहीं
आम धारणा है कि नववर्ष केवल सूर्य से जुड़ा है, परंतु शास्त्र इससे आगे की बात करते हैं।
बृहस्पति (गुरु) का प्रभाव
बृहस्पति को धर्म और ज्ञान का कारक माना गया है। नववर्ष के आसपास बृहस्पति की स्थिति समाज की नैतिक दिशा को प्रभावित करती है।
शनि का संतुलन
शनि कर्मफल दाता है। नववर्ष पर शनि की स्थिति यह संकेत देती है कि आने वाला वर्ष श्रमप्रधान होगा या फलप्रधान।
चंद्र और मन
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर चंद्रमा की कला वृद्धि अवस्था में होती है, जो मानसिक प्रसन्नता और संकल्प-शक्ति को बढ़ाती है।
विभिन्न क्षेत्रों में नववर्ष के नाम
भारत के विभिन्न भागों में यही नववर्ष अलग नामों से जाना जाता है:
गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र
उगादी आंध्र, कर्नाटक
नवरेह कश्मीर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
उत्तर भारत
नाम भिन्न हैं, आधार एक ही है।
आधुनिक नववर्ष और सनातन नववर्ष में अंतर
विषय       सनातन नववर्ष     अंग्रेज़ी नववर्ष 
आधार      प्रकृति और ग्रह  रोमन कैलेंडर     
उद्देश्य    धर्म-साधना       उत्सव/पार्टी     
स्थायित्व   शाश्वत           प्रशासनिक        
उपसंहार
सनातन नववर्ष केवल तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि सृष्टि, धर्म और चेतना के नव आरंभ का प्रतीक है। यह हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, आत्म-शुद्धि और धर्ममय जीवन की प्रेरणा देता है।
जो समाज अपने कालबोध को भूल जाता है, वह अपनी जड़ों से कट जाता है। इसलिए सनातन नववर्ष को समझना और अपनाना, केवल परंपरा नहीं बल्कि आत्मबोध है

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