एकादशी व्रत की सम्पूर्ण जानकारी: नियम, विधि, कथा और फल

एकादशी व्रत की सम्पूर्ण जानकारी: नियम, विधि, कथा और फल

 एकादशी व्रत की सम्पूर्ण जानकारी: नियम, विधि, कथा और फल

एकादशी व्रत का दिव्य स्वरूप दर्शाते भगवान श्रीहरि विष्णु वैकुंठ में शेषनाग पर विराजमान
एकादशी व्रत सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र, प्रभावशाली और शास्त्रसम्मत व्रत माना गया है। यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, इंद्रियनिग्रह और भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष उपासना का माध्यम है। पद्म पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा नारद पुराण में एकादशी व्रत की महिमा विस्तार से वर्णित है। इस लेख में एकादशी व्रत का संपूर्ण ज्ञान सरल भाषा में, किंतु शास्त्रीय आधार के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे सामान्य भक्त भी इसे भली-भांति समझ सकें और श्रद्धापूर्वक पालन कर सकें।
एकादशी का अर्थ है चंद्र मास की ग्यारहवीं तिथि। प्रत्येक मास में दो एकादशी आती हैं, एक शुक्ल पक्ष की और दूसरी कृष्ण पक्ष की। इन दोनों एकादशियों को भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया व्रत समस्त पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
एकादशी व्रत क्यों करना चाहिए
शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ा बंधन उसका मन और इंद्रियाँ हैं। एकादशी व्रत इन दोनों को नियंत्रित करने का दिव्य साधन है। पद्म पुराण के अनुसार, एकादशी तिथि स्वयं विष्णु की शक्ति से उत्पन्न हुई है। जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी का व्रत करता है, उसके पूर्व जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
एकादशी व्रत करने से:
मन और शरीर की शुद्धि होती है, विष्णु भक्ति दृढ़ होती है, कर्मों का शोधन होता है, सात्त्विकता का विकास होता है, अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग बनता है
एकादशी व्रत कब करना चाहिए
एकादशी व्रत दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाता है। दशमी के दिन सात्त्विक भोजन ग्रहण कर, रात्रि में संयम रखा जाता है। अगले दिन सूर्योदय से लेकर द्वादशी तिथि तक व्रत का पालन किया जाता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में उचित समय पर करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
यदि एकादशी तिथि सूर्योदय से पहले या बाद में हो, तो पंचांग देखकर ही निर्णय लेना चाहिए। शास्त्रों में ‘स्मार्त’ और ‘वैष्णव’ एकादशी का भी उल्लेख मिलता है, पर सामान्य गृहस्थ पंचांग अनुसार व्रत कर सकता है।
एकादशी व्रत कौन कर सकता है
शास्त्रों के अनुसार, स्त्री, पुरुष, वृद्ध, युवा सभी के लिए एकादशी व्रत कल्याणकारी है। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी चारों आश्रमों के लिए यह व्रत उपयुक्त है।
हालाँकि: अत्यंत रोगी व्यक्ति, गर्भवती स्त्रियाँ, बहुत कमजोर शरीर वाले लोग, यदि पूर्ण उपवास न कर सकें, तो फलाहार या केवल मन और कर्म की शुद्धि के साथ व्रत कर सकते हैं। शास्त्र भावना को प्रधान मानते हैं।
एकादशी व्रत की सम्पूर्ण विधि 
घर के मंदिर में एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हुए श्रद्धालु भक्त
1. दशमी की तैयारी
दशमी के दिन सात्त्विक भोजन करें, चावल, मसूर, मांस, मदिरा का त्याग करें, रात्रि में संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
2. एकादशी के दिन प्रातःकाल
ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, घर के मंदिर या पूजा स्थान की शुद्धि करें।
 3. संकल्प
हाथ में जल लेकर संकल्प करें:
“मम उपात्त समस्त पाप क्षय द्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं एकादशी व्रतं करिष्ये।”
4. भगवान विष्णु की पूजा
पीले पुष्प, तुलसी दल अर्पित करें, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें, विष्णु सहस्रनाम या गीता पाठ करें।

एकादशी व्रत की सम्पूर्ण जानकारी: नियम, विधि, कथा और फल

एकादशी व्रत कथा (संक्षेप)
पद्म पुराण में वर्णित एकादशी देवी द्वारा पापपुरुष का नाश करते हुए दिव्य दृश्य
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार पापपुरुष ने देवताओं को अत्यंत कष्ट दिया। तब भगवान विष्णु ने एक दिव्य शक्ति को उत्पन्न किया, जिसने पापपुरुष का संहार किया। वह शक्ति एकादशी कहलायी। भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि जो भी श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत करेगा, उसके पाप नष्ट होंगे।
एकादशी व्रत में जप करने योग्य मंत्र
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
विष्णु गायत्री मंत्र, हरि नाम संकीर्तन।
एकादशी व्रत में क्या खाएँ
फल, दूध, मखाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू।
क्या न खाएँ
अन्न, चावल, दालें, प्याज-लहसुन।
एकादशी व्रत की सावधानियाँ
झूठ, क्रोध, निंदा से बचें, बाल और नाखून न काटें, दिन में न सोएँ ,द्वादशी से पहले व्रत न तोड़ें।

एकादशी व्रत का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

एकादशी व्रत के आध्यात्मिक और मानसिक लाभ दर्शाता ध्यानमग्न साधक का शांत दृश्य
आध्यात्मिक रूप से यह व्रत इंद्रियनिग्रह सिखाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से उपवास पाचन तंत्र को विश्राम देता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ाता है।
एकादशी व्रत क्या है?
एकादशी व्रत भगवान श्रीविष्णु की उपासना और आत्मशुद्धि का शास्त्रसम्मत व्रत है।
एकादशी महीने में कितनी बार आती है?
प्रत्येक चंद्र मास में दो बार एक शुक्ल पक्ष और एक कृष्ण पक्ष में।
एकादशी व्रत क्यों किया जाता है?
पाप नाश, इंद्रियनिग्रह, पुण्य प्राप्ति और मोक्ष मार्ग के लिए।
एकादशी व्रत कब शुरू होता है?
दशमी से संयम रखकर एकादशी को उपवास और द्वादशी को पारण किया जाता है।
एकादशी व्रत कौन कर सकता है?
स्त्री, पुरुष, गृहस्थ, वृद्ध सभी श्रद्धापूर्वक कर सकते हैं।
एकादशी में क्या खाना चाहिए?
फल, दूध, मखाना, कुट्टू, सिंघाड़ा आदि फलाहार।
एकादशी में क्या नहीं खाना चाहिए?
अन्न, चावल, दालें, प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन।
एकादशी व्रत का मुख्य मंत्र क्या है?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”।
एकादशी व्रत का फल क्या है?
विष्णु कृपा, मानसिक शांति, पुण्य वृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति।
निष्कर्ष
एकादशी व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का साधन है। जो भक्त श्रद्धा, नियम और शुद्ध भावना से इस व्रत को करता है, वह जीवन में शांति, पुण्य और अंततः विष्णु कृपा प्राप्त करता है। सनातन धर्म में एकादशी को इसलिए सर्वोच्च व्रत कहा गया है। हरि ॐ तत्सत्।