ज़्यादा व्रत करना सही है या गलत? शास्त्र क्या कहते हैं

ज़्यादा व्रत करना सही है या गलत? शास्त्र क्या कहते हैं

ज़्यादा व्रत करना सही है या गलत? शास्त्र क्या कहते हैं

अशांत मन के साथ किया गया व्रत, खाली थाली के सामने बैठा व्यक्ति और पीछे दीपक व घंटी द्वारा सच्ची भक्ति का संकेत
यह लेख भावुक नहीं, शास्त्रीय प्रमाण पर आधारित है। हर बात के साथ यह स्पष्ट किया गया है कि किस ग्रंथ में क्या कहा गया है, श्लोक क्या है, उसका अर्थ क्या है, और व्यवहार में उसका मतलब क्या निकलता है।
प्रस्तावना
आज के समय में व्रत केवल श्रद्धा का विषय नहीं रहा, बल्कि एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा बनता जा रहा है। कोई हर सोमवार व्रत करता है, कोई प्रत्येक एकादशी, कोई नवरात्रि के अलावा भी अनेक उपवास रखता है। सोशल मीडिया पर भी यह भावना दिखाई देती है कि जितना अधिक व्रत, उतनी अधिक भक्ति। लेकिन यहीं पर शconsiderनीय प्रश्न उठता है, क्या अधिक व्रत करना हमेशा पुण्य ही देता है, या उससे दोष भी लग सकता है?
शास्त्र इस प्रश्न का उत्तर भावुकता से नहीं, बल्कि संतुलन और विवेक से देते हैं। यह लेख उसी शास्त्रीय दृष्टि से स्पष्ट करेगा कि व्रत क्या है, उसका उद्देश्य क्या है, और कब वही व्रत दोष का कारण बन सकता है।
व्रत का वास्तविक शास्त्रीय अर्थ (किस ग्रंथ में लिखा है?)
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि व्रत कोई लोक-परंपरा नहीं है, बल्कि यह वेदिक–स्मृति परंपरा का शब्द है।
ग्रंथ संदर्भ
मनुस्मृति
महाभारत (शांतिपर्व)
भागवत पुराण
भगवद्गीता
श्लोक – मनुस्मृति (6.24):
व्रतं नियमसंयुक्तं शरीरमनसोः शुचिः।
अर्थ: वही व्रत कहलाता है जिसमें नियम हो और जिससे शरीर तथा मन दोनों की शुद्धि हो।
यहाँ साफ़ कहा गया है कि अगर शरीर टूट रहा है और मन विक्षिप्त हो रहा है, तो वह व्रत नहीं, शास्त्र-विरोध है।
संस्कृत में ‘व्रत’ शब्द वृ (वरण करने) धातु से बना है। व्रत का अर्थ केवल अन्न त्याग नहीं, बल्कि एक संकल्पित अनुशासन है।
श्लोक (मनुस्मृति):
व्रतं नियमसंयुक्तं शरीरमनसोः शुचिः।
अर्थ: व्रत वही है जिसमें शरीर और मन दोनों की शुद्धि हो तथा नियम का पालन हो।
अतः जो केवल शरीर को कष्ट देकर मन में क्रोध, अहंकार या अशांति बढ़ा दे, वह शास्त्रीय अर्थ में व्रत नहीं कहलाता।
व्रत की शुरुआत कब हुई और सबसे पहले किसने किया?
यह प्रश्न बहुत लोग पूछते हैं, लेकिन उत्तर बिना ग्रंथ देखे दे दिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार:
वैदिक काल
ऋग्वेद में उपवास शब्द नहीं, बल्कि तपस् शब्द आता है। तपस् का अर्थ है – इंद्रियों को सीमित करना।
ऋग्वेद (10.154.2 भावार्थ):
ऋषि यज्ञ से पहले आहार-संयम रखते थे ताकि मन एकाग्र रहे।
शांत मुद्रा में ध्यान करते भारतीय ऋषि, साधारण आहार और जप माला के साथ संतुलित शास्त्रीय व्रत का प्रतीक
सबसे पहले किसने?
प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि-नियम के रूप में तप को स्वीकार किया, सप्तऋषियों ने यज्ञ-पूर्व उपवास को नियम बनाया उस समय व्रत नियम था, प्रतियोगिता नहीं। व्रत की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में उपवास का उल्लेख तपस् के रूप में मिलता है। ऋषि-मुनि यज्ञ से पूर्व शरीर और मन को शुद्ध करने हेतु सीमित आहार ग्रहण करते थे।
पुराणों में राजा हरिश्चंद्र, ध्रुव, सावित्री, शबरी आदि के उदाहरण मिलते हैं। इन सभी के व्रत कठोर होते हुए भी संतुलित थे, और उनका उद्देश्य आत्मशुद्धि था, न कि दिखावा।
व्रत क्यों किया जाता है? (शास्त्र क्या कहते हैं)व्रत का उद्देश्य कभी भी केवल मनोकामना पूर्ति नहीं रहा। शास्त्र चार कारण बताते हैं:
1. कर्म-शुद्धि
2. इंद्रिय-निग्रह
3. चित्त-एकाग्रता
4. अहंकार क्षय
श्लोक – महाभारत (शांतिपर्व):
न देहक्लेशन तप इत्याहुर्धीरा मनस्विनः।
अर्थ: ज्ञानी लोग कहते हैं – शरीर को कष्ट देना तप नहीं है। यानी जो व्रत शरीर को सज़ा बना दे, वह धर्म नहीं। शास्त्रों के अनुसार व्रत के चार मुख्य उद्देश्य हैं:
1. इंद्रिय संयम – स्वाद और इच्छा पर नियंत्रण
2. मन की शुद्धि – काम, क्रोध, लोभ में कमी
3. देव-स्मरण – निरंतर ईश्वर का चिंतन
4. कर्म क्षय – पूर्व कर्मों की शुद्धि
भगवद्गीता कहती है:
श्लोक (गीता 6.16):
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
अर्थ: जो बहुत अधिक खाता है या बिल्कुल नहीं खाता, दोनों के लिए योग संभव नहीं। यहाँ भगवान स्वयं संतुलन का सिद्धांत स्थापित करते हैं।
क्या ज़्यादा व्रत करने से दोष लग सकता है? (स्पष्ट शास्त्रीय उत्तर)
हाँ। और यह बात स्पष्ट रूप से शास्त्रों में कही गई है।
श्लोक  भगवद्गीता 17.5–6:
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥
अर्थ: जो अविवेकपूर्वक शरीर को कष्ट देते हैं, वे शरीर में स्थित जीव-तत्व और ईश्वर – दोनों को पीड़ा देते हैं। ऐसे लोग आसुरी प्रवृत्ति वाले कहलाते हैं।

ज़्यादा व्रत करना सही है या गलत? शास्त्र क्या कहते हैं

यह श्लोक सीधा उत्तर है: अविवेकपूर्ण कठोर व्रत = दोष।
सीधा उत्तर है—हाँ, यदि व्रत अविवेकपूर्ण, अहंकारयुक्त और शरीर-विरोधी हो, तो दोष लग सकता है। शास्त्र ‘अति’ को हर जगह दोष मानते हैं—चाहे वह भोजन हो, तप हो या व्रत। अति व्रत से लगने वाले संभावित दोष।
1. शारीरिक दोष
लगातार निर्जल या अत्यंत कठोर व्रत शरीर को कमजोर करता है। आयुर्वेद में कहा गया है कि अत्यधिक उपवास वात दोष को बढ़ाता है, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन और रोग उत्पन्न होते हैं।
2. मानसिक दोष
जब व्रत से चिड़चिड़ापन, क्रोध, ईर्ष्या बढ़ने लगे, तो समझना चाहिए कि व्रत मन को शुद्ध नहीं कर रहा, बल्कि दूषित कर रहा है।
3. अहंकार दोष
कई लोग यह भाव रखने लगते हैं “मैं सबसे अधिक व्रत करता हूँ।” यही भाव व्रत को तप से गिराकर अहंकार का साधन बना देता है।
श्लोक (गीता 17.18):
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
अर्थ: जो तप केवल मान-सम्मान और दिखावे के लिए किया जाए, वह राजस तप है और फलदायी नहीं।
4. देवता अप्रसन्नता
पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि देवता भाव से प्रसन्न होते हैं, कष्ट से नहीं। जब व्रत से व्यक्ति धर्म के मूल गुण दया, क्षमा, करुणा—को छोड़ देता है, तब वही व्रत देव-अप्रसन्नता का कारण बन सकता है।
किसे व्रत नहीं करना चाहिए? (ग्रंथों की चेतावनी) भागवत पुराण और आयुर्वेद दोनों में यह स्पष्ट किया गया है:
व्रत से वर्जित व्यक्ति:
गर्भवती स्त्री
गंभीर रोगी
अत्यधिक दुर्बल
मानसिक अस्थिरता वाला व्यक्ति
भागवत भावार्थ:
ईश्वर भक्ति को कष्ट नहीं बनाते, वे करुणा देखते हैं। ऐसे लोगों के लिए नाम-स्मरण, दान, सेवा श्रेष्ठ माने गए हैं।शास्त्र कुछ स्थितियों में व्रत से मना करते हैं: गर्भवती स्त्री, अत्यंत रोगी व्यक्ति, मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति, अत्यधिक दुर्बल शरीर वाला साधक,ऐसे लोगों के लिए नाम-स्मरण, दान और सेवा को श्रेष्ठ माना गया है। सही व्रत कैसे किया जाए? (नियम क्या हैं) शास्त्रों में व्रत के स्पष्ट नियम (नियम-विधि) दिए गए हैं:
1. संकल्प – बिना दिखावे के
2. क्षमता अनुसार – अति नहीं
3. मन शुद्धि – क्रोध वर्जित
4. भोजन त्याग से अधिक भाव
5. व्रत + दया + मौन
श्लोक – गीता 6.16:
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति…
अर्थ: न अधिक खाने वाला, न बिल्कुल न खाने वाला – योग के योग्य होता है।
1. संकल्प स्पष्ट हो – क्यों व्रत कर रहे हैं
2. शरीर की क्षमता के अनुसार – अति न करें
3. मन को शांत रखें  – क्रोध वर्जित
4. भोजन त्याग से अधिक भाव पर ध्यान
5. नियमित नहीं, विवेकपूर्ण व्रत
आज के समय में आम गलतियाँ, बिना गुरु या शास्त्र ज्ञान के व्रत, सोशल मीडिया के प्रभाव में कठोर व्रत, व्रत के दिन दूसरों पर क्रोध,केवल फल पाने की भावना
सावधानियाँ (यह नहीं किया तो व्रत दोष बनता है)
व्रत को अहंकार न बनाएं
शरीर ईश्वर का साधन है, शत्रु नहीं
भूखे रहकर कटु वचन = व्रत भंग
आवश्यकता पर व्रत तोड़ना पाप नहीं
दूसरों से तुलना सबसे बड़ा दोष है
व्रत को दंड न बनाएं
शरीर ईश्वर का मंदिर है, उसे तोड़ना भक्ति नहीं
भूखा रहकर अपशब्द बोलना व्रत भंग करता है
आवश्यकता हो तो व्रत तोड़ना दोष नहीं
विस्तृत शास्त्रीय विश्लेषण: व्रत, अति और दोष
अब तक हमने मूल ढांचा समझा। अब हर बिंदु को और गहराई से, शास्त्रीय प्रमाण के साथ समझते हैं ताकि कोई भ्रम न रहे। व्रत और तप का अंतर (यहाँ लोग सबसे ज़्यादा गलती करते हैं) अधिकांश लोग व्रत और तप को एक ही समझ लेते हैं, जबकि शास्त्र दोनों में स्पष्ट भेद करते हैं।
श्लोक – महाभारत, शांतिपर्व:
तपो नाम न देहस्य पीडनं धर्मसाधनम्।
अर्थ: शरीर को पीड़ा देना तप नहीं है और न ही वह धर्म का साधन है। इससे स्पष्ट है कि केवल भूखा रहना या निर्जल रहना न तो व्रत है, न तप।
अति व्रत से कर्म-दोष कैसे बनता है?
अविवेकपूर्ण कठोर व्रत से पीड़ित व्यक्ति, शरीर की कमजोरी और पीछे अहंकार का प्रतीक अंधकार
शास्त्रों में कर्म केवल कर्म से नहीं, भाव और परिणाम से बनता है। जब व्रत से: क्रोध बढ़े, परिवार से कटुता आए, शरीर रोगी बने, मन ईर्ष्यालु हो, तो वही व्रत कर्म-दोष में बदल जाता है।
श्लोक – गीता 18.23 (भावार्थ): जो कर्म आसक्ति और विवेक के बिना किया जाए, वह बंधन देता है। देवता क्यों अप्रसन्न होते हैं अति व्रत से? यह बहुत बड़ा भ्रम है कि देवता हमारे कष्ट से प्रसन्न होते हैं।
भागवत पुराण: भक्ति का आधार भाव है, क्लेश नहीं।
श्लोक – नारद भक्ति सूत्र (सूत्र 2):
सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।
अर्थ: भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम है, आत्म-हिंसा नहीं। जब व्रत प्रेम हटाकर अहंकार लाता है, तब देवता अप्रसन्न होते हैं। कितने व्रत करने चाहिए? (शास्त्रीय संतुलन) शास्त्र संख्या नहीं, क्षमता देखते हैं।
श्लोक – गीता 6.17:
युक्ताहारविहारस्य…
अर्थ: जो आहार, विहार, कर्म और विश्राम में संतुलित है, वही साधना योग्य है। एक व्रत भी सही भाव से किया जाए, तो सौ व्रतों से श्रेष्ठ है। गृहस्थ के लिए व्रत के अलग नियम गृहस्थ के लिए शास्त्र कठोर तप से मना करते हैं।
मनुस्मृति 6.87:
गृहस्थ का धर्म शरीर रक्षा के साथ साधना करना है। जो व्यक्ति परिवार, काम और शरीर की उपेक्षा कर केवल व्रत करे, वह धर्म नहीं करता। आज के युग में व्रत क्यों बिगड़ गया?
1. सोशल मीडिया दिखावा
2. फल-प्राप्ति की लालसा
3. गुरु का अभाव
4. शास्त्र-अज्ञान
श्लोक – गीता 16.23:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य…
अर्थ जो शास्त्र छोड़कर मनमानी करता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख। व्रत का सही विकल्प (यदि व्रत संभव न हो) शास्त्र विकल्प देते हैं:
नाम-जप
दान
सेवा
मौन

श्लोक – कलियुग संदर्भ (भागवत): नाम-स्मरण कलियुग का सर्वोच्च तप है।
क्या अधिक व्रत करने से पाप या दोष लग सकता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार यदि व्रत अविवेकपूर्ण, अहंकारयुक्त या शरीर को कष्ट देने वाला हो तो वह दोष का कारण बन सकता है।
शास्त्रों में कितने व्रत करने का नियम बताया गया है?
शास्त्र संख्या नहीं बताते, बल्कि व्यक्ति की क्षमता, अवस्था और विवेक को व्रत का आधार मानते हैं।
क्या बिना खाए रहना ही व्रत कहलाता है?
नहीं। मनुस्मृति और गीता के अनुसार व्रत केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों का संयम है।
क्या हर व्यक्ति को व्रत करना चाहिए?
नहीं। गर्भवती स्त्री, गंभीर रोगी, अत्यंत दुर्बल और मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति के लिए व्रत वर्जित माना गया है।
अति व्रत को गीता में क्यों गलत बताया गया है?
गीता 17.5–6 में अविवेकपूर्ण तप और शरीर को कष्ट देने वाले व्रत को आसुरी प्रवृत्ति कहा गया है।
व्रत के दौरान क्रोध आ जाए तो क्या व्रत टूट जाता है?
शास्त्रों के अनुसार भूखा रहकर कटु वचन बोलना व्रत के भाव को नष्ट कर देता है।
क्या व्रत न करने पर भक्ति अधूरी रहती है?
नहीं। भागवत पुराण के अनुसार नाम-स्मरण, सेवा और दान भी पूर्ण भक्ति के साधन हैं।
गृहस्थ व्यक्ति को कितने व्रत करने चाहिए?
मनुस्मृति के अनुसार गृहस्थ को शरीर और परिवार की उपेक्षा करके कठोर व्रत नहीं करने चाहिए।
क्या व्रत दिखावे के लिए करने से फल मिलता है?
नहीं। गीता 17.18 के अनुसार दिखावे और मान-सम्मान के लिए किया गया तप फलहीन होता है।
सही व्रत कैसे किया जाए?
शास्त्रों के अनुसार व्रत संकल्प, क्षमता, शांति और करुणा के साथ किया जाना चाहिए।जप करते भक्त और जरूरतमंद को जल व भोजन देते व्यक्ति, करुणा और भक्ति का शास्त्रीय स्वरूप
अंतिम निष्कर्ष Conclusion)
व्रत कोई परीक्षा नहीं, एक साधन है। यदि व्रत:
नम्रता बढ़ाए → धर्म
अहंकार बढ़ाए → दोष
शांति दे → पुण्य
अशांति दे → अविवेक
अंतिम शास्त्रीय संदेश ईश्वर को न भूख चाहिए, न प्यास उसे विवेकपूर्ण भक्ति चाहिए। यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं: धर्मः विवेकपूर्वकः। जो विवेक से किया जाए, वही धर्म है। व्रत शास्त्रों में आत्मशुद्धि का साधन है, आत्मपीड़ा का माध्यम नहीं। अधिक व्रत करना अपने आप में न पुण्य है, न पाप उसका फल व्यक्ति के विवेक, भाव और शारीरिक-मानसिक संतुलन पर निर्भर करता है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि जो व्रत अहंकार, क्रोध या शरीर-हानि उत्पन्न करे, वह दोष का कारण बन सकता है। सच्चा व्रत वही है जो मन को शांत, बुद्धि को स्थिर और हृदय को करुणामय बनाए। इसलिए व्रत हमेशा शास्त्र, क्षमता और सही भावना के साथ करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर को संख्या नहीं, शुद्ध भाव और विवेकपूर्ण भक्ति प्रिय है।

ज़्यादा व्रत करना सही है या गलत? शास्त्र क्या कहते हैं