Sanatan Diary

सनातन धर्म में पक्ष क्या होते हैं?

सनातन धर्म में पक्ष क्या होते हैं?

 शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का गहन शास्त्रीय विवेचन

"शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का शास्त्रीय संतुलन दर्शाता हुआ पूर्ण चंद्रमा, प्रकाश और अंतर्मुखता का प्रतीक"
सनातन धर्म में समय को कभी भी केवल घड़ी, तारीख या कैलेंडर तक सीमित नहीं रखा गया। हमारे ऋषियों ने समय को जीवन की चेतना, मन की अवस्था और कर्म की दिशा से जोड़ा। इसी कारण सनातन पंचांग केवल तिथियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह बताता है कि *कब क्या करना जीवन के लिए उचित है।
इसी काल-व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गूढ़ अंग है पक्ष।
बहुत से लोग शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का नाम तो जानते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पाते कि ये बनाए क्यों गए, इनका जीवन से क्या संबंध है, और शास्त्र इन्हें इतनी गंभीरता से क्यों देखते हैं। इस लेख में हम पूरे शास्त्रीय आधार, सरल उदाहरण और जीवन से जुड़े दृष्टिकोण के साथ पक्ष को समझेंगे ताकि पढ़ने वाले को केवल जानकारी नहीं, बल्कि अनुभूति भी हो।
पक्ष शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?
"पक्ष" शब्द संस्कृत की धातु पक्ष् से बना है, जिसका अर्थ होता है एक ओर झुकाव, एक दिशा या एक चरण।
सनातन दृष्टि में समय को एक सीधी रेखा नहीं माना गया, बल्कि चक्र माना गया है। उस चक्र के दो स्पष्ट चरण होते हैं,
बढ़ने का चरण
घटने का चरण
इन दोनों चरणों को ही पक्ष कहा गया। यानी पक्ष केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि काल की अवस्था है।
पक्ष कितने होते हैं?
सनातन पंचांग के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो पक्ष होते हैं
1. शुक्ल पक्ष
2. कृष्ण पक्ष

एक चंद्र मास लगभग 29 दिन 12 घंटे का होता है। इसे दो बराबर भागों में बाँट दिया गया
15 तिथियाँ शुक्ल पक्ष की
15 तिथियाँ कृष्ण पक्ष की

यही व्यवस्था हजारों वर्षों से बिना बदले चली आ रही है। चंद्रमा और मन का संबंध (शास्त्रीय आधार) ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र है "चंद्रमा मनसो जातः" अर्थात चंद्रमा से मन की उत्पत्ति हुई है।
"चंद्रमा और मन के संबंध को दर्शाती ध्यानस्थ मानव आकृति, शास्त्रीय भारतीय आध्यात्मिक दर्शन"
इसका आशय यह नहीं कि मन भौतिक रूप से चंद्रमा से बना है, बल्कि यह कि मन पर चंद्रमा का सीधा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि समुद्र में ज्वार-भाटा चंद्रमा से नियंत्रित होता है, मानव शरीर में भी जल तत्व अधिक है।
मन की स्थिति चंद्र कला के अनुसार बदलती रहती है, इसी अनुभूति के आधार पर ऋषियों ने समय को चंद्र गति से जोड़ा।
शुक्ल पक्ष क्या होता है?
अमावस्या के बाद जिस दिन से चंद्रमा की कला बढ़ने लगती है, वही शुक्ल पक्ष कहलाता है। शुरुआत: अमावस्या के अगले दिन (प्रतिपदा) अंत: पूर्णिमा जैसे-जैसे चंद्रमा बढ़ता है, वैसे-वैसे प्रकाश बढ़ता है।
"शुक्ल पक्ष की बढ़ती चंद्र कलाएं, शुभ आरंभ, पूजा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक"
शुक्ल का अर्थ क्या है?
शुक्ल का अर्थ केवल "सफेद" नहीं, बल्कि:-
प्रकाश
स्पष्टता
वृद्धि
जागृति
शुभता

शास्त्रों में शुक्ल पक्ष का महत्व

विष्णु पुराण, पद्म पुराण और स्मृति ग्रंथों में शुक्ल पक्ष को देव पक्ष कहा गया है, सात्त्विक गुण से युक्त माना गया है,
इसीलिए:-
व्रत
यज्ञ
पूजा
विवाह
गृह प्रवेश
नामकरण
नए कार्यों का आरंभ
शुक्ल पक्ष में करना श्रेष्ठ माना गया। यह समय बाहर की ओर विस्तार का होता है।
कृष्ण पक्ष क्या होता है?
पूर्णिमा के बाद जब चंद्रमा की कला घटने लगती है, उसे कृष्ण पक्ष कहते हैं। शुरुआत: पूर्णिमा के अगले दिन, अंत: अमावस्या, कृष्ण का अर्थ समझिए, कृष्ण का अर्थ यहाँ अंधकार या नकारात्मकता नहीं है। इसका अर्थ है,
"कृष्ण पक्ष की घटती चंद्र कलाएं, दीया के साथ मौन साधना और पितृ स्मरण का प्रतीक"
गूढ़ता
अंतर्मुखता
शांति,
क्षय के माध्यम से शुद्धि।
शास्त्रों में कृष्ण पक्ष का महत्व
गरुड़ पुराण और श्राद्ध कल्प में कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष से जुड़ा माना गया है, आत्मचिंतन का काल बताया गया है।इसीलिए:-
श्राद्ध
तर्पण
पिंडदान
तप
साधना
मौन,
कृष्ण पक्ष में श्रेष्ठ माने गए। यह समय भीतर की ओर लौटने का होता है।

पक्ष क्यों बनाए गए? (सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न)

सनातन धर्म में कुछ भी बिना उद्देश्य के नहीं है। पक्ष इसलिए बनाए गए क्योंकि ऋषियों ने देखा कि मनुष्य हर समय एक जैसा नहीं रह सकता कभी उसे कर्म करना होता है, कभी उसे रुककर समझना होता है, यदि जीवन केवल शुक्ल पक्ष हो तो अहंकार बढ़ेगा।
यदि जीवन केवल कृष्ण पक्ष हो तो जड़ता आएगी, इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है। पक्ष से जुड़े नियम डर नहीं, दिशा, सनातन नियम डराने के लिए नहीं, दिशा देने के लिए होते हैं।
शुक्ल पक्ष में क्या करें?
नए संकल्प लें, सकारात्मक कार्य प्रारंभ करें, देव आराधना करें, समाज और परिवार की ओर सक्रिय रहें।
कृष्ण पक्ष में क्या करें?
आत्मनिरीक्षण करें, अनावश्यक भोग कम करें, मन को शांत रखें, पूर्वजों को स्मरण करें।
पक्ष किसने बनाए?
यह प्रश्न आधुनिक दृष्टि से पूछा जाता है, लेकिन उत्तर सनातन है। पक्ष किसी राजा, किसी धर्मगुरु, किसी एक ग्रंथ
द्वारा नहीं बनाए गए।
यह व्यवस्था ऋषियों की दीर्घकालीन अनुभूति और प्रयोग का परिणाम है। वेदों में काल को जीवित तत्व माना गया है। पक्ष उसी काल की लय हैं।
"शुक्ल और कृष्ण पक्ष के माध्यम से जीवन के संतुलन और सनातन कालचक्र का प्रतीक चित्र"

आज के समय में पक्ष का महत्व

आज जब मनुष्य तनाव में है, जल्दबाज़ी में निर्णय लेता है, प्रकृति से कट चुका है, तब पक्ष की समझ उसे सिखाती है, कब आगे बढ़ना है, कब रुकना है, कब बोलना है, कब मौन रखना है।
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष क्या होते हैं?
चंद्र मास के दो चरण होते हैं चंद्रमा की कला बढ़े तो शुक्ल पक्ष, और घटे तो कृष्ण पक्ष कहलाता है।
शुक्ल पक्ष को शुभ क्यों माना जाता है?
शुक्ल पक्ष वृद्धि, प्रकाश और जागृति का प्रतीक है, इसलिए शास्त्रों में इसे देवकार्य और शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
कृष्ण पक्ष को अशुभ क्यों समझा जाता है?
कृष्ण पक्ष अशुभ नहीं है; यह आत्मचिंतन, शुद्धि और अंतर्मुखता का काल माना गया है।
चंद्रमा और मन का क्या संबंध है?
ऋग्वेद के अनुसार “चंद्रमा मनसो जातः”—चंद्रमा का प्रभाव मन की स्थिति पर पड़ता है।
शुक्ल पक्ष में कौन-से कार्य करने चाहिए?
पूजा, व्रत, विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण और नए कार्यों का आरंभ शुक्ल पक्ष में उत्तम माना गया है।
कृष्ण पक्ष में कौन-से कार्य श्रेष्ठ माने गए हैं?
श्राद्ध, तर्पण, तप, साधना, मौन और आत्मनिरीक्षण कृष्ण पक्ष में श्रेष्ठ माने गए हैं।
पक्ष व्यवस्था किसने बनाई?
पक्ष किसी व्यक्ति ने नहीं बनाए; यह ऋषियों की दीर्घकालीन अनुभूति और काल-बोध का परिणाम है।
क्या पक्ष केवल धार्मिक मान्यता है?
नहीं, पक्ष जीवन के मानसिक और कर्मगत संतुलन की शास्त्रीय व्यवस्था है।
क्या आज के समय में पक्ष का महत्व है?
हाँ, पक्ष की समझ आज के तनावपूर्ण जीवन में सही समय पर निर्णय लेना सिखाती है।
शुक्ल और कृष्ण पक्ष से क्या शिक्षा मिलती है?
शुक्ल पक्ष विकास सिखाता है और कृष्ण पक्ष विवेक दोनों मिलकर जीवन में संतुलन लाते हैं।
निष्कर्ष
पक्ष जीवन का संतुलन हैं, सनातन धर्म में पक्ष कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन की सूक्ष्म कला हैं।
शुक्ल पक्ष सिखाता है: विकास
कृष्ण पक्ष सिखाता है: विवेक
जो व्यक्ति इन दोनों को समझ लेता है, उसका जीवन स्वयं संतुलित हो जाता है। यही सनातन है। यही शाश्वत है।