वैवस्वत कल्प में सृष्टि का क्रम: युग, मानव और देव व्यवस्था भाग 1
भूमिका
सनातन धर्म में समय को केवल घड़ी या कैलेंडर से नहीं मापा गया, बल्कि उसे जीवन, सृष्टि और चेतना के साथ जोड़ा गया है। हमारे शास्त्र समय को रेखा नहीं, बल्कि चक्र मानते हैं जो बार-बार घूमता है, बदलता है और नये रूप में प्रकट होता है। इसी समय-चक्र की सबसे विशाल और गहन इकाई है कल्प।
जब हम यह प्रश्न पूछते हैं कि सृष्टि कब बनी, कब बदली और कब लय को प्राप्त होती है, तो उसका उत्तर किसी एक वर्ष या युग में नहीं, बल्कि कल्प की अवधारणा में छिपा है। यह लेख किसी शुष्क परिभाषा की तरह नहीं, बल्कि ऐसे लिखा गया है जैसे कोई गुरु शांत भाव से बैठकर शिष्य को समय का रहस्य समझा रहा हो।
कल्प का वास्तविक अर्थ क्या है?
कल्प शब्द संस्कृत की धातु “कॢप्” से बना है, जिसका अर्थ होता है व्यवस्थित करना, रचना करना, नियम में लाना। अर्थात कल्प वह कालखंड है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि व्यवस्थित रूप से प्रकट, संचालित और अंततः लय को प्राप्त होती है।
शास्त्रों के अनुसार:
एक कल्प = ब्रह्मा जी का एक दिन, इस एक दिन में सम्पूर्ण ब्रह्मांड सक्रिय रहता है, जीव, लोक, देवता, युग सब अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं कल्प केवल समय नहीं है, यह सृष्टि की कार्यशील अवस्था है।
पुराण परंपरा यह स्पष्ट करती है कि कल्प कोई कल्पना नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन का निश्चित काल है।
विष्णु पुराण और भागवत ग्रंथों में कल्प को ब्रह्मा का दिन इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसी अवधि में सृष्टि जाग्रत रहती है, जैसे मनुष्य के जागने पर उसका जीवन सक्रिय होता है।
ब्रह्मा का दिन क्यों कहा गया कल्प को?
यहाँ एक गहरी बात समझने योग्य है। ब्रह्मा कोई मानव शरीरधारी देवता नहीं, बल्कि सृजन-तत्व का प्रतीक हैं। जैसे हमारे लिए 24 घंटे का दिन-रात का चक्र होता है, वैसे ही ब्रह्मा के लिए एक दिन-रात का चक्र होता है, पर वह चक्र अरबों वर्षों में मापा जाता है।
जब ब्रह्मा जाग्रत अवस्था में होते हैं तब सृष्टि चलती है यही कल्प है। जब ब्रह्मा विश्राम अवस्था में जाते हैं तब लोक लय को जाते हैं यही ब्रह्मा की रात्रि है। इसलिए कल्प को ब्रह्मा का दिन कहा गया है।
यहाँ एक गहरी बात समझने योग्य है। ब्रह्मा कोई मानव शरीरधारी देवता नहीं, बल्कि सृजन-तत्व का प्रतीक हैं। जैसे हमारे लिए 24 घंटे का दिन-रात का चक्र होता है, वैसे ही ब्रह्मा के लिए एक दिन-रात का चक्र होता है, पर वह चक्र अरबों वर्षों में मापा जाता है।
जब ब्रह्मा जाग्रत अवस्था में होते हैं तब सृष्टि चलती है यही कल्प है। जब ब्रह्मा विश्राम अवस्था में जाते हैं तब लोक लय को जाते हैं यही ब्रह्मा की रात्रि है। इसलिए कल्प को ब्रह्मा का दिन कहा गया है।
एक कल्प की अवधि कितनी होती है?
शास्त्रों में समय की गणना अत्यंत स्पष्ट है।
कुल अवधि होती है 43,20,000 वर्ष, जिसे एक चतुर्युगी कहा जाता है। अब आगे बढ़ते हैं ब्रह्मांडीय समय की ओर। जब 1000 चतुर्युगी पूर्ण होती हैं, तब एक कल्प का निर्माण होता है।
अर्थात्:
1 चतुर्युगी = 43,20,000 वर्ष
1000 चतुर्युगी = 1 कल्प
इस प्रकार: 1 कल्प = 4,32,00,00,000 वर्ष (4.32 अरब वर्ष / 432 करोड़ वर्ष)
यह संख्या केवल गणित नहीं है, यह दर्शाती है कि सनातन दर्शन में समय को कितनी सूक्ष्म और वैज्ञानिक दृष्टि से देखा गया है।
युगों की संरचना: समय का नैतिक उतार-चढ़ाव
कल्प के भीतर समय केवल बीतता नहीं, बल्कि चरित्र और चेतना भी बदलती है। यह परिवर्तन युगों के माध्यम से होता है।
1. सत्य युग
पूर्ण धर्म
सत्य, तप, करुणा का उत्कर्ष, मानव और देवता के बीच दूरी न्यूनतम।
2. त्रेता युग
पूर्ण धर्म
सत्य, तप, करुणा का उत्कर्ष, मानव और देवता के बीच दूरी न्यूनतम।
2. त्रेता युग
धर्म का एक चरण घटता है, यज्ञ, मर्यादा और राजधर्म का विकास।
3. द्वापर युग
धर्म का आधा भाग शेष, भक्ति का महत्व बढ़ता है, अधर्म का प्रवेश स्पष्ट होता है।
धर्म का आधा भाग शेष, भक्ति का महत्व बढ़ता है, अधर्म का प्रवेश स्पष्ट होता है।
4. कलियुग
धर्म का केवल एक चरण, बाह्य विकास, आंतरिक पतन, परंतु नाम-स्मरण द्वारा मोक्ष संभव, यह चक्र 1000 बार चलता है तभी एक कल्प पूर्ण होता है।
धर्म का केवल एक चरण, बाह्य विकास, आंतरिक पतन, परंतु नाम-स्मरण द्वारा मोक्ष संभव, यह चक्र 1000 बार चलता है तभी एक कल्प पूर्ण होता है।
कल्प और स्मृति का सिद्धांत
सनातन शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक कल्प के अंत में सृष्टि का लय होता है, पर स्मृति का नहीं। जीव अपने कर्मों और संस्कारों को बीज रूप में साथ लेकर अगले कल्प में प्रवेश करता है। इसी कारण चेतना बार-बार नये अनुभवों के माध्यम से विकसित होती रहती है।
क्या हर कल्प समान होता है?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। उत्तर है नहीं। हर कल्प में: वही शाश्वत सत्य रहता है पर घटनाएँ, अवतार, व्यवस्थाएँ बदलती हैं।
जैसे एक ही सूर्य हर दिन उगता है, पर हर दिन समान नहीं होता वैसे ही हर कल्प अलग अनुभव लेकर आता है।
वर्तमान कल्प: श्वेतवाराह कल्प
हम जिस समय-चक्र में अभी स्थित हैं, उसे शास्त्र श्वेतवाराह कल्प कहते हैं।
इस कल्प में: भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया पृथ्वी को रसातल से उठाया सृष्टि को पुनः संतुलित किया।
यह नाम केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि यह बताता है कि यह कल्प संरक्षण और पुनर्स्थापन का प्रतीक है।
वैवस्वत कल्प क्या है? वर्तमान सृष्टि चक्र
कल्प में भगवानों की भूमिका
कल्प के भीतर त्रिदेव की भूमिका अत्यंत स्पष्ट है:
ब्रह्मा — सृजन की व्यवस्था करते हैं
विष्णु — सृष्टि का पालन करते हैं
शिव — समय आने पर संहार करते हैं
विष्णु — सृष्टि का पालन करते हैं
शिव — समय आने पर संहार करते हैं
यह तीनों अलग नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के कार्यात्मक रूप हैं।
कल्प का उद्देश्य क्या है?
कल्प का उद्देश्य केवल सृष्टि बनाना नहीं, बल्कि: जीवों को कर्म का अवसर देना, चेतना को विकसित होने देना धर्म और अधर्म का संतुलन दिखाना।
अंततः मोक्ष की ओर मार्ग प्रशस्त करना इसलिए कल्प कोई दंड नहीं, बल्कि अवसर है।
कल्प और दायित्व-बोध
कल्प यह सिखाता है कि समय केवल बहने वाला तत्व नहीं, बल्कि दायित्व का संकेत है। प्रत्येक युग, प्रत्येक अवस्था जीव को यह स्मरण कराती है कि उसके कर्म न केवल उसके लिए, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि-संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कल्प में पुनरावृत्ति नहीं, परिष्कार
कल्प में घटनाएँ दोहराई नहीं जातीं, बल्कि परिष्कृत होती हैं। हर नया कल्प चेतना के अगले स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। यह बताता है कि सृष्टि का उद्देश्य चक्र में फँसना नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से परिपक्वता प्राप्त करना है।
कल्प को ब्रह्मा का दिन क्यों कहा गया है और इसका शास्त्रीय आधार क्या है?
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के एक दिन में सृष्टि की रचना, विस्तार और संचालन होता है। यही अवधि कल्प कहलाती है। विष्णु पुराण और भागवत परंपरा में स्पष्ट कहा गया है कि जैसे मनुष्य के लिए दिन कर्म का समय है, वैसे ही ब्रह्मा के लिए कल्प सृष्टि-संचालन का काल है।
एक कल्प की पूर्ण अवधि कितनी होती है और इसमें कितने युग आते हैं?
एक कल्प की अवधि 4.32 अरब मानव वर्ष मानी गई है। इसमें 1000 महायुग होते हैं। प्रत्येक महायुग में चार युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग क्रम से आते हैं। यह क्रम हर कल्प में समान रहता है।
क्या हर कल्प में वही देवता और वही व्यवस्था रहती है या परिवर्तन होता है?
हर कल्प में पद वही रहते हैं, पर धारक बदल सकते हैं। इन्द्र, मनु, सप्तऋषि जैसे पद बदलते रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सनातन व्यवस्था स्थिर नहीं, बल्कि योग्यता और कर्म के अनुसार गतिशील है।
कल्प के अंत में प्रलय कैसी होती है और जीवों का क्या होता है?
कल्प के अंत में नैमित्तिक प्रलय होती है, जिसमें स्थूल सृष्टि लय हो जाती है। पर जीव नष्ट नहीं होते। वे अपने कर्म और संस्कारों को सूक्ष्म बीज रूप में लेकर अगले कल्प में पुनः सृष्टि में प्रवेश करते हैं।
कल्प और युग की अवधारणा से मानव जीवन के कर्म और दायित्व का क्या संबंध है?
कल्प यह सिखाता है कि समय केवल बीतने वाली इकाई नहीं, बल्कि कर्म का परिणाम देने वाली शक्ति है। हर युग मानव को उसके आचरण, कर्तव्य और उत्तरदायित्व का बोध कराता है। व्यक्ति का कर्म केवल उसके जीवन नहीं, बल्कि सृष्टि-संतुलन को भी प्रभावित करता है।
इस भाग में समय की व्यवस्था को समझाया गया है, जबकि आगे आने वाले लेख में उसके प्रभावों और परिणामों पर चर्चा की गई है:
निष्कर्ष
कल्प केवल समय की गणना नहीं, बल्कि चेतना के विकास की एक दिव्य व्यवस्था है। ब्रह्मा का दिन कहलाने वाला कल्प सृष्टि, कर्म और संस्कारों के निरंतर प्रवाह को दर्शाता है। प्रत्येक युग जीव को उसके दायित्व का स्मरण कराता है और यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि का संचालन केवल परिवर्तन से नहीं, बल्कि संतुलन और उत्तरदायित्व से होता है।
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