नवरात्रि, दुर्गा पूजा, अष्टमी-नवमी आरती

माँ दुर्गा सिंह पर विराजमान, आठ भुजाओं में शस्त्र धारण किए, आधुनिक भक्ति कला शैली में दिव्य रूप
                                      श्री दुर्गा जी की आरती (शास्त्रानुसार)
                                          श्री दुर्गा माता की आरती
                                            ॥ जय अम्बे गौरी ॥
                                 जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
                                निशदिन तुमको ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
                                   
                                 माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।
                                 उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥

                                 कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
                                 रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥

                                 केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
                                 सुर-नर-मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

                                  कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
                                  कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥

                                  शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती।
                                  धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥

                                  चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
                                  मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

                                   ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
                                   आगम-निगम बखानी, तुम शिव-पटरानी॥

                                    चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों।
                                    बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥

                                    तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
                                    भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति करता॥

                                    भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
                                    मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

                                   कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
                                   श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गाती॥

                                    कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावै।
                                    जो कोई श्रद्धा से गावै, माँ उसको फल पावै॥

                                   जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥

                           नवरात्रि, दुर्गा पूजा, अष्टमी-नवमी आरती अर्थ

                             जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ॥
                              निशदिन तुमको ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
अर्थ:
 हे माँ अम्बे! हे श्यामा गौरी! आपकी जय हो। भगवान विष्णु, ब्रह्मा और महादेव भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।
                               माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ॥
                               उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
अर्थ:
आपकी माँग में सिंदूर शोभायमान है, ललाट पर कस्तूरी का तिलक सुशोभित है। आपके नेत्र अत्यंत उज्ज्वल हैं और मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
                       कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ॥
                       रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥
अर्थ:
आपका शरीर स्वर्ण के समान कांतिमान है, आप लाल वस्त्र धारण करती हैं। गले में लाल पुष्पों की माला शोभा देती है।
                      केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ॥
                      सुर-नर-मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी ॥
अर्थ:
आप सिंह पर विराजमान हैं, हाथों में खड्ग और खप्पर धारण किए हुए हैं। देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि आपकी सेवा करते हैं, और आप सबके दुखों का नाश करती हैं।
                       कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ॥
                       कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति ॥
अर्थ:
आपके कानों में कुंडल सुशोभित हैं, नाक में मोती का आभूषण दमक रहा है। आपकी आभा करोड़ों चंद्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी है। 
                    शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती ॥
                    धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥
अर्थ
आपने शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया, महिषासुर का वध किया। आपके नेत्र अत्यंत प्रचंड हैं, आप सदा अधर्म का नाश करती हैं।
                     चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ॥
                     मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥
अर्थ:
आपने चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज का अंत किया, मधु और कैटभ दैत्यों का भी संहार किया। आपने देवताओं को भयमुक्त किया।
                      ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी ॥
                      आगम-निगम बखानी, तुम शिव-पटरानी ॥
अर्थ:
आप ब्रह्माणी, रुद्राणी और लक्ष्मी स्वरूपा हैं। वेद और शास्त्रों में आपकी महिमा वर्णित है। आप भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं।
                        चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों ॥
                        बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू ॥
अर्थ:
चौंसठ योगिनियाँ आपका मंगलगान करती हैं, भैरव नृत्य करते हैं। ढोल, मृदंग और डमरू की ध्वनि गूँजती है।
                     तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता ॥
                     भक्तन की दुख हरता, सुख संपत्ति करता ॥
अर्थ:
आप ही इस जगत की माता हैं, आप ही पालन करने वाली हैं। आप भक्तों के दुख हरकर उन्हें सुख और समृद्धि प्रदान करती हैं।
                      भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी ॥
                       मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी ॥
अर्थ:
आपकी चार भुजाएँ अत्यंत शोभायमान है, आप वरदान देने की मुद्रा में रहती हैं। जो स्त्री-पुरुष आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
                     कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ॥
                     श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥

अर्थ:
स्वर्ण थाल में कपूर और दीपक से आपकी आरती होती है। आप अनंत रत्नों के समान प्रकाशमान हैं।
                     श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै ॥
                      कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावै ॥

अर्थ:
जो कोई भी श्रद्धा से माँ अम्बे की आरती गाता है, वह सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करता है। आरती करने की सही विधि , (संक्षेप में)दीपक घी या तिल के तेल का हो, 3, 5 या 7 बार आरती घुमाएँ, अंत में माँ से क्षमा याचना करें,
प्रसाद ग्रहण करें। 
माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप, सिंह वाहन पर विराजमान, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक
माँ दुर्गा की आरती क्यों की जाती है?
माँ दुर्गा की आरती देवी को श्रद्धा, भक्ति और कृतज्ञता अर्पित करने के लिए की जाती है। आरती से वातावरण शुद्ध होता है और भक्त का मन देवी से जुड़ता है।
क्या आरती करना शास्त्रों में बताया गया है?
हाँ, पुराणों और भक्ति परंपरा में आरती को उपासना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। यह बाह्य पूजा के साथ-साथ अंतःकरण की शुद्धि भी करती है।
नित्य पूजा में सुबह या शाम, विशेष रूप से नवरात्रि, अष्टमी, नवमी और शुक्रवार के दिन आरती करना श्रेष्ठ माना गया है।
माँ दुर्गा की आरती करने की सही विधि क्या है?
दीप प्रज्वलन के बाद माँ का ध्यान कर श्रद्धा से “जय अम्बे गौरी” आरती गाई जाती है और दीपक को घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है।
क्या आरती बिना मंत्र जाने भी की जा सकती है?
हाँ, यदि भाव शुद्ध हो तो केवल आरती गाने मात्र से भी माँ प्रसन्न होती हैं। भक्ति में भाव सबसे प्रधान होता है।
आरती करते समय कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए?
आरती करते समय मन एकाग्र रखें, बातचीत न करें, आरती बीच में न रोकें और पूर्ण श्रद्धा के साथ पाठ करें।
क्या माँ दुर्गा की आरती करने से कष्ट दूर होते हैं?
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, श्रद्धा से की गई आरती से भय, रोग और मानसिक कष्ट दूर होते हैं तथा जीवन में शांति आती है।
आरती में दीपक कितनी बार घुमाना चाहिए?
सामान्य पूजा में 3 बार, विशेष पूजा में 5 बार और नवरात्रि में 7 बार दीपक घुमाना शुभ माना गया है।
क्या महिलाएँ और पुरुष दोनों आरती कर सकते हैं?
हाँ, माँ दुर्गा की आरती स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभी कर सकते हैं। भक्ति में कोई भेद नहीं होता।
माँ दुर्गा की आरती का मुख्य फल क्या है?
आरती करने से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जीवन में सुख-शांति, शक्ति, आत्मविश्वास और समृद्धि का वास होता है।
माँ दुर्गा की आरती कब करनी चाहिए?

                                                नवरात्रि, दुर्गा पूजा, अष्टमी-नवमी आरती Durga Maa

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